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अमेरिकी कारपोरेट आने वाले दिनो में भारत के किसानों को हर तरह से अपने कब्जे में रखने की प्लानिंग कर चुका है। इसके तहत मोदी सरकार से एक स्कीम बनाई गई है जिसे स्वामित्व योजना कहा जा रहा है।

इसके तहत ड्रोन की मदद से गावों का डिजिटल मैप तैयार किया जाएगा और उन गांवों में डिजिटल मैप तैयार हो जाने के बाद रेसिडेंशियल प्रॉपर्टी के मालिकों को राज्य सरकारों की तरफ से एक संपत्ति कार्ड दिया जाएगा और उस संपत्ति कार्ड के आधार पर लोग बैंक से उस संपत्ति पर लोन ले पाएँगे लेकिन इससे यह प्रॉपर्टी संपत्ति टैक्स के दायरे में भी आएगी। जिसे हर साल भरना होगा।

अभी तक खेती की जमीन का रिकॉर्ड खसरा—खतौनी में होता है। लेकिन गांवों की आवासीय संपत्ति का कोई रिकॉर्ड नहीं होता है। ऐसे में ‘स्वामित्व स्कीम’ के जरिए हर आवासीय संपत्ति की पैमाइश कर मालिकाना हक सुनिश्चित किया जाएगा। अब इस स्कीम ड्रोन से सर्वेक्षण कर गांव की सीमा में आने वाली प्रत्येक संपत्ति का डिजिटल नक्शा बनाया जाएगाा। इससे प्रत्येक राजस्व खंड की सीमाएं भी तय की जाएंगी।

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साफ है कि अमेरिकी कारपोरेट की नीतियों के तहत अब कांट्रेक्ट फार्मिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है अब किसान भूमि का मालिक नही रह जाएगा अब वह अपने ही खेत मे एक गुलाम की भाँति कार्य करेगा।

कारपोरेट दबाव के फलस्वरूप ऐसी ही नीतियां अफ्रीका में लागू की गई है अब भारत का नम्बर है लेकिन अब सरकार कृषि क्षेत्र के लिए मूल्य वर्धन के लिए किसानो की आवासीय संपत्ति को दांव पर लगा उसे गिरवी रखवाने की योजना बना रही है अब कांट्रेक्ट फार्मिंग में कम्पनियाँ खुद खेती कर सकेंगी।

आमतौर पर अनुबंध खेती का मतलब है कि बुआई के समय ही बिक्री का सौदा हो जाता है ताकि किसान को भाव की चिंता न रहे। लेकिन मोदी सरकार द्वारा पारित वर्तमान कानून में अनुबन्ध की परिभाषा को बिक्री तक सीमित न करके, उसमें सभी किस्म के कृषि कार्यों को शामिल किया गया है।